यह ब्लॉग खोजें

शनिवार, 9 जनवरी 2016

16 अप्रैल 1853 को स्थापित हुई थी भारतीय रेल..150 सालों से एशिया के सबसे बड़े और दुनिया के दूसरे सबसे बड़े रेल नेटवर्क का तमगा है हमारी भारतीय रेल के सिर पर...हर रोज करीब पौने दो करोड़ लोग यात्रा करते हैं हमारी रेलवे से...इतने रिकॉर्ड...इतनी उपलब्धियां है हमारी रेलवे के खाते में कि गिनना मुश्किल है...मगर ये सिर्फ किताबी हैं...असल में भारतीय रेल अव्यवस्था और असुरक्षित सफर की कहानी बन चुकी है...रेलवे की हालत सुधारने की तमाम कोशिशें हुईं मगर बात बनी नही...ट्रेन हादसे और ट्रेनों में होने वाली वारदातें भी थमी नहीं है...सवाल उठता है कि आखिर बुनियादी सुविधाएं सुधारे बगैर सफर सुरक्षित कैसे होगा...आखिर यात्रियों के लिए कब तक रेलवे का सफर खौफनाक बनता रहेगा..हिन्दुस्तान में यातायात के लिए सबसे बड़ा साधन है रेलवे...हर दिन करोड़ों लोगों को अपनी मंजिल तक पहुंचाने वाली रेलवे नेटवर्क और स्ट्रैंथ के मामले में दुनिया में स्थान रखती है...मगर हिफाजत के सवाल पर रेलवे की सूरत ना कल बदली थी ना आज बदली है...खासकर रेल में सफर करने वाली महिलाओं की सुरक्षा का सवाल हमेशा ही उलझा रहा है...पश्चिमी चंपारण जिले के बेतिया में तीन महिलाओं का शव रेलवे ट्रैक पर मिला है...जिसने रेलवे की सुरक्षा पर एक बार फिर  गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं...
लाखों लोगों को हर रोज मंजिल तक पहुंचाती है...किफायत में सफर कराती है रेल, सरपट पटरियों पर दौड़ती शहरों के बीच का वक्त घटाती है रेल...
मगर ना जाने क्यों डराती है ये रेल...अकेले हों तो खौफ जगाती है रेल...आखिर क्यों मुसीबत बढ़ाती है रेल...
 बिहार के बेतिया से सामने आईं ये तस्वीरें रेलवे के उस खौफनाक सफर की कहानी बयान कर रही हैं जिसका शिकार हो गईं तीन महिलाएं...रेलवे ट्रैक पर तड़पती मिली इन तीनों महिलाओं के साथ क्या हुआ...ये कैसे ट्रैक पर आईं...ये सवाल अभी तक सुलझा नहीं है...तीनों में से एक की मौत हो गई है जबकि दो की हालत गंभीर है...आशंका जताई जा रही है कि इन तीनों को चलती ट्रेन से फेंका गया होगा...

 जरा सोचिए...घर से अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए कोई निकले और मंजिल से पहले ही किसी वारदात का शिकार हो जाए...फिर सवाल क्यों ना उठें...बेतिया के सिंहाछापर गुमटी के पास मिली इन तीन महिलाओं की कहानी भी ऐसी ही रही है...आशंका है कि नरकटियागंज से हाजीपुर जा रही इंटरसिटी एक्सप्रेस से इन महिलाओं को फेंका गया होगा...पीड़ित दो महिलाओं की शिनाख्त हो गई है...इनमें ममता नाम की महिला खलीलाबाद और श्रेया नाम की महिला सहारनपुर की रहने वाली है...तीसरी महिला की अभी तक पहचान नहीं हो पाई है

बताते हैं कि ये महिलाएं ट्रैक पर कबसे पड़ी थीं ये जानकारी किसी को नहीं थी..गांववालों ने इन्हें देखा और जीआरपी को फोन किया...जिसके बाद इन्हें अस्पताल ले जाया गया...बेतिया से आई ये हैरान करने वाली वारदात सवाल खड़े करती है रेलवे की सुरक्षा के उन दावों पर जो सालों से हो रहे हैं मगर हालात नहीं बदले...बेतिया की इस घटना ने रेलवे की हदों के भीतर हुए उन तमाम गुनाहों की कड़वी यादें ताजा कर दी हैं...जिन्होने रेलवे की सुरक्षा को सवालों के घेरे में खड़ा किया है...फिर चाहे बाराबंकी के कर्मभूमि एक्सप्रेस में लूटपाट की वारदात हो...मुगलसराय में सेना के जवान पर लगे छेडखानी के आरोप हों या फिर पश्चिम बंगाल में सेना के जवानों की वो करतूत जिसमें उन्होने एक नाबालिग को शराब पिलाकर रेप किया था....ये तमाम घटनाएं बीते कुछ दिनों की हैं...इन तमाम वारदातों ने रेलवे के असुरक्षित होते सफर की तस्वीरें दिखाईं है...



रविवार, 18 मार्च 2012

गैरों पे करम, अपनों पे सितमःदादा ये क्या कर डाला

जिससे राहत की उम्मीदें थीं उसी ने अपना पिटारा खोल दर्द बांटने की कवायद शुरु कर दी....किचेन का बजट गड़बड़ाता नज़र आया और आम आदमी की थालियां पहले से महंगी हो गईं.....सैलरी मिलने से पहले से चुकाया जाने वाला टैक्स पहले से ही रुला रहा था...लेकिन राहत के नाम पर आयकर छूट में महज 20 हज़ार की बढ़ोतरी....अभी पेट्रोल की क़ीमतें बढ़ेंगी ये सोच कर कलेजा बैठा जा रहा था....घर के कामकाज से थकी-मादी पत्नी को कभी-कभार बाहर ले जाकर खिलाने के सिलसिले में भी अड़चनें आती दिखीं....अब होटलों में बतौर सर्विस टैक्स ज्यादा रकम जो चुकानी पड़ेगी.....टेलीफोन के बिलों में बढ़ोतरी होगी सो अलग.....फिक्र को धुंए में उड़ाना भी पहले से महंगा हो चला.....आम आदमी का दिल बैठा जा रहा था...जहां ग़रीबों की जेबें ढीली कर...कॉरपोरेट्स के खजाने भरने की साजिशें चल रही हो...उस देश का भगवान ही मालिक है....लेकिन तभी क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर ने देशभर के दुखियारों का दुख मिटा डाला...बजट से मुरझाए आम आदमी के चेहरे पर तब मुस्कान तैरने लगी जब सचिन ने अपना सौंवा शतक लगा दिया.....वित्तमंत्री के डंडे की चोट का असर जाता रहा........ले ले सरकार जो लेना चाहती है.....लेकिन अब इस मौक़े पर खुश होने से भला हम क्यूं चूकें.....ये वो पल है जो आजतक किसी ने नहीं देखा....आने वाली पीढ़ियां कभी किसी को सौंवा शतक जड़ते देख सकेंगी या नहीं ये भी नहीं पता..... आम आदमी फिर मुस्कुराने लगा....उधर सरकार ने भी राहत की सांस ली....चलो मीडिया से पिंड छूटा....सचिन ने अपना महाशतक लगाया तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स का एक मसखरा जुमला कम हो गया ...जिसमें कहा जाता था कि महाशतक को राष्ट्रीय प्रतीक्षा का दर्जा दे देना चाहिए....लेकिन इंतजार भारतीयों की नियति है....लिहाजा महंगाई से कब तक निजात मिलेगी इसका इंतजार जारी है....

किसका बजटः बजट को लेकर सवालों के घेरे में सरकार है और विपक्ष की ओर से लगातार इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं....भाजपा ने आरोप लगाया कि सरकार ने इस  बजट के जरिए सिर्फ कारपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाया है....दादा के बजट में टैक्स का बोझ है....सब्सिडी में कटौती के संकेत हैं ...पूरा देश डर रहा है....क्योंकि सब्सिडी घटने का मतलब है डीजल पेट्रोल कैरोसिन और एलपीजी की कीमतें बढ़ेंगी......ये वो जरूरते हैं जिनका असर आम आदमी की रसोई और थालियों पर पड़ता है....यानि कि साफ है दादा ने घर का बजट बिगाड़ने की पूरी तैयारी कर ली है...बजट को लेकर अभी चर्चा जारी है.....ये कितना आम जनता का बजट है और कितना बाज़ार का ...इसपर भी बहस की गुंजाइश बेशक बनती है....लेकिन इस माथापच्ची के बीच दादा ने जो हंटर दे मारा है....उसे झेलना तो आम जनता को ही है...ये सबकुछ तब हो रहा है जब पीएम ये दावा करते हैं कि भारत विकसित होने की ओर बढ़ चला है....अर्थशास्त्री आंकड़ों का लॉलीपॉप देकर बार बार ये बताने की कोशिश करते हैं कि देश विकास कर रहा है...सवाल ये कि कहां है विकास और कैसा है विकास और इस विकास की कीमत अगर दादा के इस बजट से चुकानी पड़ेगी तो विकसित देश में जीने के लिए  बचेगा कौन...विदर्भ में किसानो के लिए बजट में प्रावधान किया गया ये बताने के लिए कि सरकार किसानों को लेकर खासी चिन्तित है...लेकिन वहीं ईपीएफ में ब्याज दरें 9.5 फीसदी से घटाकर 8.25 फीसदी करके पांच करोड़ नौकरी पेशा लोगों की जेब काट ली गई....सवाल ये कि किसानों को फायदा होगा कि नहीं होगा ये तो बाद की बात है...लेकिन 12 से 14 घंटे काम करने के बाद अपनी मेहनत की कमाई जमा करने वालों को भी मिल रहे फायदे से उन्हे महरूम करना कहां तक जायज है.....किसानों को कितना फायदा होगा ये समझना भी मुश्किल नहीं.....क्योंकि सरकार की तमाम योजनाओं के बाद भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं ये एक कड़वा सच है.....अनाज पैदा होता है लेकिन खरीदने वाला कोई नहीं होता ये भी एक हकीकत है.....अनाज खरीद भी लिया तो गोदामों में सड़ जाता है ये असलियत है...और जब राशन की दुकानों पर आम लोग उसी राशन को खरीदने जाते हैं तो दुनिया भर के टैक्स थोप कर ये बताया जाता है कि ये इम्पोर्टेड अनाज है इसलिए अगर इसे खरीदना है तो चुकाना ही होगा...जाहिर है बजट किसका है और इसमें आम आदमी की कितनी हिस्सेदारी है...आम आदमी का कितना हित है...कितना फायदा मिलना है...ये ऐसे तमाम सवाल है जिनका जवाब प्रणब दा ने नहीं दिया....सियासत का दस्तूर है सत्ता पक्ष तारीफ करता है और विपक्ष आलोचना...बजट के बाद वही हो रहा है....लेकिन इन सबके बीच इतना साफ हो चुका है कि देश के लोगों को कम से कम साल भर तो आधा पेट ही खाना होगा.....आगे का भगवान मालिक है...

रविवार, 22 जनवरी 2012

आग से खेल रहे दिग्विजय सिंह !

देश इन दिनों ज्वालामुखी के मुंह पर बैठा हुआ है...दरअसल चुनावों के ठीक पहले धर्म को लेकर जिस तरह की सियासत शुरु हुई है उसका अंजाम सोचकर ही डर लग रहा है....मुस्लिम आरक्षण से शुरु हुई बयानबाजी अब चार साल पुराने बाटला एन्काउन्टर पर जाकर टिक गई है....एक ओर दिग्विजय सिंह हैं जो कि बार बार एन्काउन्टर पर सवाल उठाते रहे हैं..वहीं दूसरी ओर केन्द्र सरकार के नुमाइंदे इसे सही बता रहे हैं... हालात कुछ बड़े विचित्र और उलझाउ बन पड़े हैं....आजमगढ़ में राहुल गांधी के विरोध के बाद दिग्विजय सिंह ने जिस तरह से इस मुद्दे को तूल दिया उससे खुद उन्ही की पार्टी सांसत में आ गई है....क्योंकि बाटला एन्काउन्टर जिस वक्त हुआ उस वक्त ना केवल दिल्ली में बल्कि केन्द्र में भी उन्ही की पार्टी की सरकार थी...ऐसे में दिग्गी राजा के इस बयान के बाद सवाल सबसे पहले सरकार पर ही उठेंगे....सवाल ये नहीं कि बटला एन्काउन्टर गलत था या सही बल्कि सवाल ये है कि इस बहाने जो राजनीति हो रही है वो काफी खतरनाक है....इस बात का अंदाजा या तो दिग्विजय सिंह को नहीं है या फिर अगर है भी तो वो आग से खेलने की कोशिश कर रहे हैं....खुद अपनी ही पार्टी की सरकार को कटघरे में खड़ा करके आखिर दिग्विजय सिंह को क्या मिलने वाला....दरअसल इसके पीछे जो कारण समझ में आता है वो यूपी चुनाव है.....मुस्लिम वोटों पर एकाधिकार स्थापित करने की नीयत से ही ये बयानबाजी की जा रही है.....आजमगढ़ में राहुल का विरोध जिस तरह से किया गया उससे कांग्रेसी रणनीतिकार खासे बेचैन हैं...ऐसे में राहुल के सलाहकार माने जाने वाले दिग्विजय सिंह अगर लगातार अपने बयान पर अड़े हैं तो समझना मुश्किल नहीं कि कहीं ना कहीं से उन्हें इसके लिए हरी झंडी जरूर मिल रही है...उधर इस मामले का असर भी सामने आना शुरु हो गया है......योगगुरु स्वामी रामदेव पर प्रेस कांफ्रेन्स के दौरान हमला भी इसी की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है....हमला करने वाले कामरान सिद्दीकी के बारे में बताया जा रहा है कि वो रामदेव से बाटला हाउस मामले पर सवाल करना चाहता था....और अनुमति नहीं मिलने पर नाराजगी में ऐसा किया....लेकिन ये एक ऐसा तर्क है जो आसानी से नहीं पचता....क्योंकि रामदेव से ये सवाल पूछने का कोई बड़ा कारण नजर नहीं आता....अब इस पूरे परिदृश्य को गौर से देखने पर एक डर भी पैदा हो रहा है...डर ये कि क्या दिग्विजय सिंह की सियासी बयानबाजियों का असर होने लगा है....उधर दूसरी पार्टियों ने भी सरकार और दिग्विजय सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है....कुल मिलाकर चुनावी माहौल में नफरत की सियासत शुरु हो गई है....खुद को अल्पसंख्यकों का सबसे बड़ा रहनुमा साबित करने की होड़ में एक ऐसे मुद्दे को हवा दी जा रही है जिसका चैप्टर लगभग बंद हो चुका है.....इन सबके बीच मोहनचन्द्र शर्मा की याद किसी को नहीं आ रही.....उनके परिवार की सुध किसी को नहीं है.....इतना नहीं इस बात की भी परवाह नहीं कि अगर बाटला पर हो रही सियासत ने गंभीर रूप अख्तियार कर लिया तो नतीज़े क्या होंगे....और सबसे बड़ा सवाल ये कि बटला एनकाउन्टर के जिन्न को बार बार बोतल के बाहर निकालने पर क्या किसी खतरनाक आक्रोश को दावत नहीं दी जा रही........

चौराहे पर कौन अन्ना या टीम अन्ना ?



पिछले साल 16 अगस्त का दिन.....हाथों में झंडे सर पर अन्ना टोपी....दिल्ली के रामलीला मैदान में दस दिनों तक मेले का माहौल....मैदान में जितने लोग भी मौजूद थे या फिर जो भी आ जा रहे थे...सबकी जुबान पर बस एक ही स्वर अन्ना अऩ्ना....जितनी भीड़ उसमें नब्बे प्रतिशत संख्या युवाओं की....देश जूनून में लिपटा था...क्या गांव क्या शहर क्या कस्बे सब के सब भ्रष्टाचार के खिलाफ महायुद्ध में अपना योगदान देने के लिए चले आ रहे थे....एक ऐसा दृश्य जिसे टीवी पर देखने से ज्यादा सभी लोग महसूस कर रहे थे....जो भी रामलीला मैदान या देश के किसी भी कोने में भी इस आन्दोलन का हिस्सा बना उसे ऐसा ही लगता था कि बस अन्ना जी यहां से अनशन जब तोड़ेंगे तब तक भ्रष्टाचार का अन्त हो जाएगा..नहीं भी होगा तो जनलोकपाल के रुप में एक ऐसा चाबुक कानून बन जाएगा जिसके डर से सभी भ्रष्टाचारी मैदान छोड़ भाग जाएंगे....
सवाल ये नहीं कि ये आन्दोलन कितना सफल और कितना बड़ा था...सवाल सबसे बड़ा ये है कि इस आन्दोलन के साथ लोगों की भावनाएं जुड़ गई थीं....लेकिन फिर दूसरे ही सीन में टीम अन्ना के अहम सदस्य प्रशान्त भूषण की पिटाई और अरविन्द केजरीवाल के उपर चप्पलों से वार.....आखिर इसका सबब क्या है....क्या अन्ना का तिलिस्म टूट रहा है....सवाल ये भी है क्या ये महज तिलिस्म था...क्या मीडिया के द्वारा बनाए गए इस तिलिस्मी आन्दोलन का मतलब केवल रेगिस्तान के पानी जैसा ही थी.....ये कुछ ऐसे सवाल है जिनसे आज देश का हर बुद्धिजीवी दो चार हो रहा है....टीवी पर गलाफाड़ फाड़ के चिल्लाने वाले प्रस्तोताओं की भाषा बदल गई है....अन्ना के आन्दोलन के दौरान रामलीला मैदान से जो टीवी संपादक लाइव देने में अपना सौभाग्य समझते थे आज वही टीम अन्ना के सदस्यों पर सवाल उठाने के लिए बकायदा ऐसे हीलोगों का पैनल बैठा रहे है जो कि उनके खिलाफ बोले और उनकी खिंचाई करे....आखिर ये परिवर्तन क्यों....
दरअसल इन बदली हुई स्थितियों के पीछे जो कारण मुझे समझ आ रहे है वो थोड़े से उलझाउ और आक्रामक है....मैने अपने अब तक के जीवन में इतना बड़ा आन्दोलन नहीं देखा....जेपी का आन्दोलन मेरे पैदा होने से पहले हो चुका था और आजादी का आन्दोलन तो मेरे पिताजी के पैदा होने से पहले....ऐसे में सामूहिक सामाजिक चेतना वाले आन्दोलन से मेरा सरोकार केवल किताबों में लिखी बातों तक ही सीमित है...ऐसे में ये आन्दोलन देखना मेरे लिए एक ऐसा अनुभव था मानों लगता था कि मैं अपनी पीढ़ीयों से गर्व से कहूंगा कि मैने अन्ना को देखा था....लेकिन वर्तमान परिस्थितियो में अब ये चाहत खत्म होनेलगी है.....मुझे लगता है कि या तो ये एक प्रायोजित आन्दोलन था या फिर इसके पीछे सरकार की ही कोई साजिश थी.....ये भी हो सकता है कि देश को अस्थिर करने की कोशिशों के अन्तर्गत ही हो.....हो सकता है मेरे इस विचार से आपको लगने लगे कि मैं दिग्विजय  सिंह की भाषा बोल रहा हूं.....लेकिन नहीं....दरअसल बारीकी से देखने पर कहीं ना कहीं ऐसा लगता है कि अन्ना के आन्दोलन में जो भी चेहरे आए वो बस मोहरे थे.....असली खिलाड़ी कहीं ना कहीं कोई और था....हो सकता है वो देश के संचेतनात्मक सोच रखने वाले लोग हों या फिर कोई विदेशी हाथ....
जरा गौर कीजिए पिछले साल में दुनिया भर में मची हलचलों के बारे में....ट्यूनिशिया, मिश्र, लीबीया जैसे देशो में हुए आन्दोलनों के पीछे कौन था....हमारे देश के वामपंथी बड़ी आसानी से कह सकते हैं कि अमेरिका की साजिश थी...कुछ का ये भी कहना हो सकता है कि देश के लोगो की स्वतःस्फूर्त सोच थी.....लेकिन लीबीया में विद्रोहियों के पास गद्दाफी से मुकाबला करने के लिए हथियार कहां से आए....वो भी इतनी बड़ी मात्रा में.....ये कुछ उदाहरण देना मैं इसलिए जरुरी समझता हूं क्योंकि अपने देश में भी कुछ ऐसे ही सवाल उठ रहे हैं....भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इतने बड़े अहिंसक आन्दोलन का खड़ा होना .....वो भी ऐसे वक्त मे जबदेश की एक बड़ी आबादी खाने पीने की व्यवस्था करने में ही त्रस्त है....टीम अन्ना के लोगों को मिली इतनी बड़ी फंडिग....हवाई जहाजों से यात्राएं...आन्दोलनों के दौरान ताम झाम......ये सभी कुछ ऐसे सवाल है जिनका जवाब देशके हर व्यक्ति को जानना जरुरी है...आन्दोलन की भावनाओं में बह के तो किसी ने इसके बारे में नहीं सोचा लेकिन जब लहर ठंडी हुई तो सवाल कौंध रहे हैं....इन्ही सवालों का फायदा उठाने के लिए सरकार के नुमाइंदे अपनी हर संभव कोशिश कर रहे हैं..जो भी सरकार की ओर से किया जा रहा है वो या तो ये दिखाने की कोशिश हैकि अगर आगे कोई  जनान्दोलन हुआ तो इसका यही हश्र किया जाएगा...या फिर इस आन्दोलन की आड़ में सरकार अपने तमाम दागों को धोकर ये दिखाने की कोशिश में है  तुम दागी हो ....और हमने हमारे दाग धो लिए हैं....जरा गौर किजीए रामदेव का आन्दोलन जिसे बलपूर्वक दबाया गया और छूटते ही इतने मामले लाद दिए गये कि बाबा कोर्ट कचहरी तक का चक्कर लगातेलगाते हलकान है....लेकिन टीम अन्ना के खिलाफ सरकार ने आक्रामक रुख तब दिखाया जब टूजी घोटाले में चिदंबरम का नाम सामने आया .....यानि कि जबतक यूपीए के सहयोगियों के खिलाफ डंडा चल रहा था तब तक तो ठीक था लेकिनज्योहीं कांग्रेस का अपना कॉलर काला पड़ने लगा तो एकाएक टीम अन्ना के लोगों के खिलाफ मामलों की बाढ़  आ गई.....दरअसल मेरी व्यक्तिगत राय ये है कि चिदंबरम साहब के बाद अब नम्बर पीएमओ का लगने वाला था....और अगर ये छींटे पीएम तक पहुंचते तो फिर कांग्रेस को जनता के सामने मुंह दिखाना मुश्किल हो जाता...
आइए अब आपको एक वाकया बताते हैं....दरअसल जब रामदेव का आन्दोलन कुचला गया तो उस समय कुछ बेबसाइटों पर एक खबर छपी थी...उसका मजमून कुछ यूं था कि दरअसल बाबा रामदेव को आन्दोलन करनेके लिए कांग्रेस के ही लोगों ने उकसाया था...कोशिश थी कि इस बहाने भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में बने माहौल को उकसायाजाए और फिर रामदेव के जरिए कालेधन पर एक तिलिस्मी कानून बनाकर क्रेडिट ले ली जाए,.....रामदेव ने भी यही किया और आन्दोलन छेड़ दिया...यही वजह रही कि बाबा जब आन्दोलन करने के लिए दिल्ली आए तो चार चार मंत्री उनकी आगवानी करने के लिए पहुंचे....लेकिन मामला तब बिगड़ा जब रामलीला मैदान में भारी भीड़ इकठ्ठी होगई...रामदेव को लगा कि अगर अब झुके तो इस भीड़ का गुस्सा भी भड़क सकता है..वास्तविकता ये थी कि इतना ज्यादा भीड़ जुटने की उम्मीद खुद रामदेव को भी नहीं थी....एक बारगी उन्हें लगा कि इतनी भीड़ के सहारे तो वे सीधे सरकार से बराबरी की जंग कर सकते हैं मोहरा बनने की जरुरत ही नहीं...लिहाजा  अपने पूर्व में किए गए वादे से बाबा मंत्रियों की मीटींग में पलट गए और फिर जो हुआ वो दुनिया ने देखा.....बाबा की वादाखिलाफी से खार खाई सरकार ने सबक तो सिखाया ही साथ ही बाबा की तमाम परते भी ऐसी उधेडी कि दोबारा बाबा रामदेव को इतना बड़ा आन्दोलन खड़ा करने में पसीने छूट जाए.
इन तमाम उदाहरणों के बीच अन्ना हजारे पर उंगली उठाने की जुर्रत नहीं कर सकता ....क्योंकि उनकी छवि पर कोई दाग नहीं है....लेकिन टीम अन्ना के लोगों पर मुझे भरोसा  नहीं..आन्दोलन शुरु हुआ तो बेहतर औऱ बेदाग था इस पर कोइ शक नहीं...लेकिन अन्ना को विश्वास में लिए बिना उनकी टीम के लोगों ने काफी कुछ कर डाला..जो शायद अन्ना को भी रास नहीं आया...हिसार चुनाव के दौरान...अऩ्ना का मौन इस बात का प्रमाण है ....दरअसल टीम के लोगो ने भी आन्दोलन को इस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां से खुद अन्ना भी एक सम्मानजनक अन्त चाहते हैं...अगर वे अपनी नाराजगी का खुलकर इजहार कर देते हैं तो ऐसे में उनकी खुद की छवि भी धूमिल हो जाएगी...कुल मिला कर टीम के लोगों की कारस्तानियां अन्ना पर ही भारी पड़ रही है जहां से वे ना तो कदम पीछे खींच सकते हैं और ना ही विरोध कर सकते है..यही वजह है कि अन्ना से अन्ना की वजह से जुडे लोग अलग होते जा रहे है....जैसे राजेन्द्र सिंह और पी राजगोपाल....दूसरी ओर कुमार विश्वास जैसे लोग भी है जिन्हें आन्दोलन के पहले सिर्फ उनकी कविताओं के लिए एक सीमित वर्ग में जाना जाता था...लेकिन आन्दोलन के जरिए उन्हे भी पर्याप्त हाईप मिल गई... अब उनकी कविताओं की दुकान भी अच्छी चलेगी...साथ ही उम्मीद है कि नौकरी भी..... क्योंकि जैसे ही उनकी नौकरी पर संकट आया उन्होने तपाक से कोर कमेटी भंग करने की मांग कर डाली थी....सीन साफ है कि इस पूरे आन्दोलन से जो जिस मकसद से जुड़ा था वो पूरा हो गया .....प्रसिद्धि चाहिए थी मिल गई.....एनजीओ को फंडिग चाहिए थी वो भी मिल गई.....रही बात मुकदमों की ..तो वे तो चलते ही रहेंगे....तारीख पर तारीखें पड़ेगी...और फिर जब हल्ला मचना बंद होगा तो धीरे से खत्म भी हो जाएगा...लेकिन इन सबके बीच उन लोगों का क्या जो बिना किसी स्वार्थ के इस मुहिम से जुड़ गए थे...और सबसे बड़ा सवाल कि खुद अन्ना हजारे का क्या जिनके कंधे पर बंदूक रखकर उनके सहयोगियों ने खुद तो अपनी वाली कर ली लेकिन अन्ना कहां है....राजघाट पर दौड़ लगाने वाला वो उर्जावान बुजुर्ग नजर नहीं आता...अब सिर्फ एक बीमार और बेबस अन्ना अस्पताल में हैं और उनका आन्दोलन चौराहे पर....जैसा कि खुद अरविंद केजरीवाल कह चुके हैं...