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रविवार, 22 जनवरी 2012

चौराहे पर कौन अन्ना या टीम अन्ना ?



पिछले साल 16 अगस्त का दिन.....हाथों में झंडे सर पर अन्ना टोपी....दिल्ली के रामलीला मैदान में दस दिनों तक मेले का माहौल....मैदान में जितने लोग भी मौजूद थे या फिर जो भी आ जा रहे थे...सबकी जुबान पर बस एक ही स्वर अन्ना अऩ्ना....जितनी भीड़ उसमें नब्बे प्रतिशत संख्या युवाओं की....देश जूनून में लिपटा था...क्या गांव क्या शहर क्या कस्बे सब के सब भ्रष्टाचार के खिलाफ महायुद्ध में अपना योगदान देने के लिए चले आ रहे थे....एक ऐसा दृश्य जिसे टीवी पर देखने से ज्यादा सभी लोग महसूस कर रहे थे....जो भी रामलीला मैदान या देश के किसी भी कोने में भी इस आन्दोलन का हिस्सा बना उसे ऐसा ही लगता था कि बस अन्ना जी यहां से अनशन जब तोड़ेंगे तब तक भ्रष्टाचार का अन्त हो जाएगा..नहीं भी होगा तो जनलोकपाल के रुप में एक ऐसा चाबुक कानून बन जाएगा जिसके डर से सभी भ्रष्टाचारी मैदान छोड़ भाग जाएंगे....
सवाल ये नहीं कि ये आन्दोलन कितना सफल और कितना बड़ा था...सवाल सबसे बड़ा ये है कि इस आन्दोलन के साथ लोगों की भावनाएं जुड़ गई थीं....लेकिन फिर दूसरे ही सीन में टीम अन्ना के अहम सदस्य प्रशान्त भूषण की पिटाई और अरविन्द केजरीवाल के उपर चप्पलों से वार.....आखिर इसका सबब क्या है....क्या अन्ना का तिलिस्म टूट रहा है....सवाल ये भी है क्या ये महज तिलिस्म था...क्या मीडिया के द्वारा बनाए गए इस तिलिस्मी आन्दोलन का मतलब केवल रेगिस्तान के पानी जैसा ही थी.....ये कुछ ऐसे सवाल है जिनसे आज देश का हर बुद्धिजीवी दो चार हो रहा है....टीवी पर गलाफाड़ फाड़ के चिल्लाने वाले प्रस्तोताओं की भाषा बदल गई है....अन्ना के आन्दोलन के दौरान रामलीला मैदान से जो टीवी संपादक लाइव देने में अपना सौभाग्य समझते थे आज वही टीम अन्ना के सदस्यों पर सवाल उठाने के लिए बकायदा ऐसे हीलोगों का पैनल बैठा रहे है जो कि उनके खिलाफ बोले और उनकी खिंचाई करे....आखिर ये परिवर्तन क्यों....
दरअसल इन बदली हुई स्थितियों के पीछे जो कारण मुझे समझ आ रहे है वो थोड़े से उलझाउ और आक्रामक है....मैने अपने अब तक के जीवन में इतना बड़ा आन्दोलन नहीं देखा....जेपी का आन्दोलन मेरे पैदा होने से पहले हो चुका था और आजादी का आन्दोलन तो मेरे पिताजी के पैदा होने से पहले....ऐसे में सामूहिक सामाजिक चेतना वाले आन्दोलन से मेरा सरोकार केवल किताबों में लिखी बातों तक ही सीमित है...ऐसे में ये आन्दोलन देखना मेरे लिए एक ऐसा अनुभव था मानों लगता था कि मैं अपनी पीढ़ीयों से गर्व से कहूंगा कि मैने अन्ना को देखा था....लेकिन वर्तमान परिस्थितियो में अब ये चाहत खत्म होनेलगी है.....मुझे लगता है कि या तो ये एक प्रायोजित आन्दोलन था या फिर इसके पीछे सरकार की ही कोई साजिश थी.....ये भी हो सकता है कि देश को अस्थिर करने की कोशिशों के अन्तर्गत ही हो.....हो सकता है मेरे इस विचार से आपको लगने लगे कि मैं दिग्विजय  सिंह की भाषा बोल रहा हूं.....लेकिन नहीं....दरअसल बारीकी से देखने पर कहीं ना कहीं ऐसा लगता है कि अन्ना के आन्दोलन में जो भी चेहरे आए वो बस मोहरे थे.....असली खिलाड़ी कहीं ना कहीं कोई और था....हो सकता है वो देश के संचेतनात्मक सोच रखने वाले लोग हों या फिर कोई विदेशी हाथ....
जरा गौर कीजिए पिछले साल में दुनिया भर में मची हलचलों के बारे में....ट्यूनिशिया, मिश्र, लीबीया जैसे देशो में हुए आन्दोलनों के पीछे कौन था....हमारे देश के वामपंथी बड़ी आसानी से कह सकते हैं कि अमेरिका की साजिश थी...कुछ का ये भी कहना हो सकता है कि देश के लोगो की स्वतःस्फूर्त सोच थी.....लेकिन लीबीया में विद्रोहियों के पास गद्दाफी से मुकाबला करने के लिए हथियार कहां से आए....वो भी इतनी बड़ी मात्रा में.....ये कुछ उदाहरण देना मैं इसलिए जरुरी समझता हूं क्योंकि अपने देश में भी कुछ ऐसे ही सवाल उठ रहे हैं....भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इतने बड़े अहिंसक आन्दोलन का खड़ा होना .....वो भी ऐसे वक्त मे जबदेश की एक बड़ी आबादी खाने पीने की व्यवस्था करने में ही त्रस्त है....टीम अन्ना के लोगों को मिली इतनी बड़ी फंडिग....हवाई जहाजों से यात्राएं...आन्दोलनों के दौरान ताम झाम......ये सभी कुछ ऐसे सवाल है जिनका जवाब देशके हर व्यक्ति को जानना जरुरी है...आन्दोलन की भावनाओं में बह के तो किसी ने इसके बारे में नहीं सोचा लेकिन जब लहर ठंडी हुई तो सवाल कौंध रहे हैं....इन्ही सवालों का फायदा उठाने के लिए सरकार के नुमाइंदे अपनी हर संभव कोशिश कर रहे हैं..जो भी सरकार की ओर से किया जा रहा है वो या तो ये दिखाने की कोशिश हैकि अगर आगे कोई  जनान्दोलन हुआ तो इसका यही हश्र किया जाएगा...या फिर इस आन्दोलन की आड़ में सरकार अपने तमाम दागों को धोकर ये दिखाने की कोशिश में है  तुम दागी हो ....और हमने हमारे दाग धो लिए हैं....जरा गौर किजीए रामदेव का आन्दोलन जिसे बलपूर्वक दबाया गया और छूटते ही इतने मामले लाद दिए गये कि बाबा कोर्ट कचहरी तक का चक्कर लगातेलगाते हलकान है....लेकिन टीम अन्ना के खिलाफ सरकार ने आक्रामक रुख तब दिखाया जब टूजी घोटाले में चिदंबरम का नाम सामने आया .....यानि कि जबतक यूपीए के सहयोगियों के खिलाफ डंडा चल रहा था तब तक तो ठीक था लेकिनज्योहीं कांग्रेस का अपना कॉलर काला पड़ने लगा तो एकाएक टीम अन्ना के लोगों के खिलाफ मामलों की बाढ़  आ गई.....दरअसल मेरी व्यक्तिगत राय ये है कि चिदंबरम साहब के बाद अब नम्बर पीएमओ का लगने वाला था....और अगर ये छींटे पीएम तक पहुंचते तो फिर कांग्रेस को जनता के सामने मुंह दिखाना मुश्किल हो जाता...
आइए अब आपको एक वाकया बताते हैं....दरअसल जब रामदेव का आन्दोलन कुचला गया तो उस समय कुछ बेबसाइटों पर एक खबर छपी थी...उसका मजमून कुछ यूं था कि दरअसल बाबा रामदेव को आन्दोलन करनेके लिए कांग्रेस के ही लोगों ने उकसाया था...कोशिश थी कि इस बहाने भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में बने माहौल को उकसायाजाए और फिर रामदेव के जरिए कालेधन पर एक तिलिस्मी कानून बनाकर क्रेडिट ले ली जाए,.....रामदेव ने भी यही किया और आन्दोलन छेड़ दिया...यही वजह रही कि बाबा जब आन्दोलन करने के लिए दिल्ली आए तो चार चार मंत्री उनकी आगवानी करने के लिए पहुंचे....लेकिन मामला तब बिगड़ा जब रामलीला मैदान में भारी भीड़ इकठ्ठी होगई...रामदेव को लगा कि अगर अब झुके तो इस भीड़ का गुस्सा भी भड़क सकता है..वास्तविकता ये थी कि इतना ज्यादा भीड़ जुटने की उम्मीद खुद रामदेव को भी नहीं थी....एक बारगी उन्हें लगा कि इतनी भीड़ के सहारे तो वे सीधे सरकार से बराबरी की जंग कर सकते हैं मोहरा बनने की जरुरत ही नहीं...लिहाजा  अपने पूर्व में किए गए वादे से बाबा मंत्रियों की मीटींग में पलट गए और फिर जो हुआ वो दुनिया ने देखा.....बाबा की वादाखिलाफी से खार खाई सरकार ने सबक तो सिखाया ही साथ ही बाबा की तमाम परते भी ऐसी उधेडी कि दोबारा बाबा रामदेव को इतना बड़ा आन्दोलन खड़ा करने में पसीने छूट जाए.
इन तमाम उदाहरणों के बीच अन्ना हजारे पर उंगली उठाने की जुर्रत नहीं कर सकता ....क्योंकि उनकी छवि पर कोई दाग नहीं है....लेकिन टीम अन्ना के लोगों पर मुझे भरोसा  नहीं..आन्दोलन शुरु हुआ तो बेहतर औऱ बेदाग था इस पर कोइ शक नहीं...लेकिन अन्ना को विश्वास में लिए बिना उनकी टीम के लोगों ने काफी कुछ कर डाला..जो शायद अन्ना को भी रास नहीं आया...हिसार चुनाव के दौरान...अऩ्ना का मौन इस बात का प्रमाण है ....दरअसल टीम के लोगो ने भी आन्दोलन को इस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां से खुद अन्ना भी एक सम्मानजनक अन्त चाहते हैं...अगर वे अपनी नाराजगी का खुलकर इजहार कर देते हैं तो ऐसे में उनकी खुद की छवि भी धूमिल हो जाएगी...कुल मिला कर टीम के लोगों की कारस्तानियां अन्ना पर ही भारी पड़ रही है जहां से वे ना तो कदम पीछे खींच सकते हैं और ना ही विरोध कर सकते है..यही वजह है कि अन्ना से अन्ना की वजह से जुडे लोग अलग होते जा रहे है....जैसे राजेन्द्र सिंह और पी राजगोपाल....दूसरी ओर कुमार विश्वास जैसे लोग भी है जिन्हें आन्दोलन के पहले सिर्फ उनकी कविताओं के लिए एक सीमित वर्ग में जाना जाता था...लेकिन आन्दोलन के जरिए उन्हे भी पर्याप्त हाईप मिल गई... अब उनकी कविताओं की दुकान भी अच्छी चलेगी...साथ ही उम्मीद है कि नौकरी भी..... क्योंकि जैसे ही उनकी नौकरी पर संकट आया उन्होने तपाक से कोर कमेटी भंग करने की मांग कर डाली थी....सीन साफ है कि इस पूरे आन्दोलन से जो जिस मकसद से जुड़ा था वो पूरा हो गया .....प्रसिद्धि चाहिए थी मिल गई.....एनजीओ को फंडिग चाहिए थी वो भी मिल गई.....रही बात मुकदमों की ..तो वे तो चलते ही रहेंगे....तारीख पर तारीखें पड़ेगी...और फिर जब हल्ला मचना बंद होगा तो धीरे से खत्म भी हो जाएगा...लेकिन इन सबके बीच उन लोगों का क्या जो बिना किसी स्वार्थ के इस मुहिम से जुड़ गए थे...और सबसे बड़ा सवाल कि खुद अन्ना हजारे का क्या जिनके कंधे पर बंदूक रखकर उनके सहयोगियों ने खुद तो अपनी वाली कर ली लेकिन अन्ना कहां है....राजघाट पर दौड़ लगाने वाला वो उर्जावान बुजुर्ग नजर नहीं आता...अब सिर्फ एक बीमार और बेबस अन्ना अस्पताल में हैं और उनका आन्दोलन चौराहे पर....जैसा कि खुद अरविंद केजरीवाल कह चुके हैं...

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